अजीब आफत है! लोग आजकल भी विवेक और अंतरात्मा की बातें करते हैं। मेरे ऑफिस में शोरी जी की गिनती बेहद कामयाब लोगों में होती है- मजाल है कि कोई भी बॉस आ जाए और शोरी जी की उससे न पटे। क्या खूबी पाई है अगले ने। जिस सांचे में ढालो, उसी में ढल जाता है। साहब को ब्लैक कॉफी पसंद है तो वह भी कॉफी ही पीता है, चाय पसंद है तो चाय। अगर साहब कोल्ड ड्रिंक्स के शौकीन निकले तो अगला सर्दी में भी आइसक्रीम खा लेगा। और अगर कहीं खाँटी स्वदेशी तेवर के हुए तो नींबू पानी पर उतर आएगा। साहब के जॉइन करने से पहले उसका पूरा बायोडाटा उसकी जेब में रहता है- कब कौन सी ड्रेस साहब को पसंद है और कौन से कलर से साहब भड़क जाते हैं।
खैर, केवल इतने भर से कोई सफल नहीं हो सकता, सो मैंने उनसे एक दिन चाय-वाय पिला कर उनकी सफलता का राज पूछा। पहले तो वे हंसे फिर बोले, तुम्हारे पास सबसे कीमती चीज क्या है? अब सौभाग्य से कहिए या दुर्भाग्य से, मुझे कोई खानदानी प्रॉपर्टी तो मिली नहीं है और अपनी खानदानी शिक्षा को देखूं तो संस्कार से कीमती चीज मुझे कुछ लगती नहीं। मैने झट से कहा भाई साहब, मुझे अपना विवेक ही अपनी सबसे कीमती चीज लगती है।
वे बोले इस युग में तुम गुजारा कैसे कर लेते हो विवेक रख कर? क्या मतलब मैं समझा नहीं, मैंने कहा। वे मुस्कराए, फिर बोले, नहीं-नहीं कोई बात नहीं, मैं तो बस इतना कह रहा था कि तुम्हें नौकरी करने में मुश्किल होती होगी और नौकरी क्या हर मामले में तुम सफर करते होगे।
सो तो है, मैं आश्चर्यचकित सा बोला- आखिर आपको मेरी समस्या का पता कैसे चला? आफिस से लेकर मार्केट तक हर जगह मेरी बहस होती रहती है। कभी सामान खरीदते समय एमआरपी को लेकर तो कभी पैकेट पर छपी एक्सपायरी डेट को देखकर। और बॉस से तो लफड़ा आए दिन का मसला है- कभी मुझे उसका एटीकेट पसंद नहीं आता और कभी उसका बातचीत का लहजा।
वे बोले समस्या तुम्हारी नहीं, विवेक की है। मैं चौंका, क्योंकि यह बहस का समय नहीं था और मुझे उनकी सफलता का राज जानना था। मैंने पूछा, भाई यह समस्या मेरे साथ ही क्यों है, विवेक तो आपके पास भी है और हर आदमी के पास होता है। कम से कम हिन्दुस्तान में तो ऐसा ही है, फिर आपको समस्या क्यों नहीं होती?
वे मुस्कराए, फिर बोले- यही तो फर्क है मुझ में और तुम में। मेरा विवेक फ्लेक्सिबिल है, तुम्हारी तरह रिजिड नहीं है कि बस एक जगह अड़ कर बैठ गया। क्या मतलब- मैंने पूछा- आखिर आप अपने विवेक को कहां रखते हैं और कैसे सेट करके इसे फ्लेक्सिबल बनाते हैं? वे मुस्कराए और बोले- देखो दोस्त, जब मैं ऑफिस में घुसता हूँ तो बाहर दरबान की खूंटी पर अपने विवेक को टांग देता हूँ और आराम से पूरा दिन नौकरी करता हूँ। मेरे पास नौकरी के समय विवेक होता ही नहीं, इसलिए टेंशन और लड़ाई का सवाल ही नहीं उठता। घर लौटते समय खूंटी से उतार कर विवेक को कंधे पर टांग लेता हूँ।
वेरी स्मार्ट, मैंने मन ही मन सोचा। फिर पूछा- और आप रीढ़ की हड्डी का क्या करते हैं? इस बार वे गंभीर हो गए। फिर बड़े ही दार्शनिक लहजे में बोले- इंसान को यही एक चीज भगवान ने फालतू दी है। अगर रीढ़ की हड्डी न होती तो हमारे देश के लोग और ज्यादा तरक्की करते। मुझे लगा पूछूं, आपको अपने देश में किस आदमी के भीतर रीढ़ की हड्डी दिखाई देती है, क्योंकि मुझे तो कोई भी भ्रष्टाचार, अन्याय और गलत बात के खिलाफ तन कर खड़ा दिखाई नहीं देता। खैर, वे कह रहे हैं तो होगी अभी भी कहीं बची हुई रीढ़ की हड्डी।
मैंने पूछा, वैसे भाई साहब ये रीढ़ की हड्डी आपको सबसे फालतू क्यों लगती है? वे बोले, देखिए इसकी वजह से हमें रेंगने मे बड़ी असुविधा होती है, आप से क्या छुपाना। इसे फ्लेक्सिबल बनाने के लिए मुझे रोज योगासन करना पड़ता है।

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