लवलीन की इन चालों से दुखी होकर मौसी ने फोन किया था और मैं उनके घर पहुंचा था। वह मुझे दुख का भागीदार बनाना चाहती थीं सो मैं बन गया। मुझ पर अपने दुख उड़ेलकर मौसी का भारी मन हल्का होने लगा। वह शांत हो गईं और फिर उन्होंने मुझे तसल्ली से फ्रूट क्रीम खिलाई, जिसके बाद कुछ फ्रूटफुल बातचीत उनसे हुई।
मैंने पूछा था, 'मौसी जी आप तो इतनी समझदार हैं, आप लवलीन भाभी जी को कुछ क्यों नहीं समझातीं।'
' पुत्तर जी' वह बोलीं, 'असि तां बचपन विच पढ़के गूढ़ लित्ता सी कि बेटा जी सीख बाको दीजिए, जाको सीख सुहाए। हुंण जद मैं ही ओनूं नहीं सुहांदी तां मेरी शिक्षा ओनूं की सुहाएगी। तुसी जवांई जी, मेरी गल्ल, मेरी शिकशा सब कुज सुन लेंदे हो, ऐस करके मैं सुणा देंदी हैं। मैं जाणदी हैं कि थवानुं ओ सुहांदी वी है।'
' हां मौसी आप भाभी की भेदभरी बातें जानने के बाद भी उन्हें जतलाती नहीं हैं कि आपको अंदर की बात पता है। अच्छा मौसी जी आपकी तो किसी से बिगड़ती नहीं है, फिर भाभी से क्यों...।' मैंने पूछा।
' पुत्तर मेरा प्यार दा फॉर्म्यूला सब जगह काम आंदा है, पर ऐत्थे फेल हो जांदा है।' मौसी ने कहा था।
' मौसी आपका फॉर्म्यूला क्या है? मैं जान सकता हूं?'
' लैं पुत्तर जी की गल कीत्ती। तुस्सी तां फारमूले वाले ही हो, जरूर जान सकदे हो। सिंपल जई गल्ल है कि किसी दे वी उत्ते कोई रिश्ता ना लदो। जो जिस तरह है ओनूं ओदां ही समझो तां व्यवहार करो।'
' कुछ समझा नहीं मैं।'
' देखो तुसी साडी भानजी दे हस्बैंड हो, ऐस करके जवाई हो। हुंण मैं सोचा कि तुसी मेरे पुत्तर वरगे हो जाओ-तां एक गलत है। जवाई जवाई है बेटा थोड़े ही है। मैं थवाडी वाइफ दी मासी हैं। हुंण ओ मैंनू मां दी तरह समझे, तां ठीक नहीं है।'
मैंने अचकचाकर कहा, 'मौसी जी इसमें गलत क्या है। जब बहू घर में आती है, सब उसे बेटी की तरह सोचते हैं। बहू भी सास को मां के रूप में देखती है।'
जवाई जी एक ही गलती है। तुसी दस्सो सास कदी मां हो सकदी है। मां मां है, सास सास है। बहू बहू है, तां बेटी बेटी है। इक सास अपनी बहू नूं बेटी क्यों समझदी है, ओ क्यों उम्मीद रखदी है कि ओ बहू नाल बहू दा रिश्ता नहीं रख सकदी। दूसरी तरफ सास नूं सास क्यों नई समजया जांदा। ओनूं जबर्दस्ती मां बनांदे ने। ऐस करके झगड़े हुंदे ने।'
मुझे बात में दम नजर आया। मैंने प्यार के फॉर्म्युले के बारे में विचार किया। झगड़े की जड़ लादा गया रिश्ता होता है। मैंने मौसी से कहा, 'आप ठीक हैं। हम जो हैं उसे कबूल नहीं करते। कुछ और लादते हैं, जैसे मैं सोचता हूं मेरा भाई दोस्त जैसा हो, मेरा दोस्त बिल्कुल भाई हो। मुझे ऐसा होटल चाहिए, जो घर जैसा हो। मेरा घर ऐसा हो जैसे होटल होता है।'
' शबाश पुत्तर। तुसी इंटेलिजेंट बन गए। सानूं गांव दे विच शहर वरगा सब कुज चाहिए दा है, तां शहर विच असि गांव वरगा चांदे हैं। तुसी समज गए कि मैं तां लवलीन नूं बहू ही मानदी हैं, पर ओ मैंनू सास नहीं मां देखना चांदी है। जद मैं हैं ही सास तां मां किस तरां वखाई दवांगी।
अब मेरे मन में था कि जल्दी से घर भागूं और सुधा को प्यार का फॉर्म्युला समझाऊं, जो मुझे पति नहीं प्रेमी समझना चाहती है। पर...पर...मैं भी तो उसमें प्रेमिका ही देखना चाहता हूं। तो झगड़ा...होगा ही क्या?'

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