Webdunia: Portal - Search - Mail - Greetings   More >>
Support | Font Download | Feedback
Search  
Welcome, Guest  [ Register | Sign In ]

लेखक’: मुंशी प्रेमचंद की कहानी

लेखकः मुंशी प्रेमचंद



प्रातःकाल महाशय प्रवीण ने बीस दफा उबाली हुई चाय का प्याला तैयार किया और बिना शक्कर और दूध के पी गए। यही उनका नाश्ता था। महीनों से मीठी, दूधिया चाय न मिली थी। दूध और शक्कर उनके लिए जीवन के आवश्यक पदार्थों में न थे।



घर में गए जरूर कि पत्नी को जगाकर पैसे माँगें, पर उसे फटे-मैले लिहाफ में निद्रामग्न देखकर जगाने की इच्छा न हुई। सोचा, शायद मारे सर्दी के बेचारी को रात-भर नींद न आई होगी, इस वक्त जाकर आँख लगी है। कच्ची नींद में जगा देना उचित न था। चुपके से चले आए।



चाय पीकर उन्होंने कलम-दवात सँभाली और वह किताब लिखने में तल्लीन हो गए, जो उनके विचार में इस शताब्दी की सबसे बड़ी रचना होगी, जिसका प्रकाशन उन्हें गुमनामी से निकालकर ख्याति और समृद्धि के स्वर्ग पर पहुंचा देगा। आधे घंटे बाद पत्नी आँखें मलती हुई आकर बोली, ‘ क्या तुम चाय पी चुके?’



प्रवीण ने सहास्य मुख से कहा, ‘ हाँ, पी चुका। बहुत अच्छी बनी थी।’ ‘पर दूध और शक्कर कहाँ से लाए?’ ‘दूध और शक्कर तो कई दिनों से नहीं मिलता। मुझे आजकल सादी चाय ज्यादा स्वादिष्ट लगती है। दूध और शक्कर मिलाने से उसका स्वाद बिगड़ जाता है। डाक्टरों की भी यही राय है कि चाय हमेशा सादी पीनी चाहिए। यूरोप में तो दूध का बिल्कुल रिवाज नहीं है। यह तो हमारे यहाँ के मधुर-प्रिय रईसों की ईजाद है।’



‘जाने तुम्हें फीकी चाय कैसे अच्छी लगती है। मुझे जगा क्यों न लिया?’ पैसे तो रखे थे। महाशय प्रवीण फिर लिखने लगे। जवानी ही में उन्हें यह रोग लग गया था और बीस साल से वह उसे पाले हुए थे। इस रोग में देह घुल गई, स्वास्थ्य घुल गया और चालीस की अवस्था में बुढ़ापे ने आ घेरा, पर यह रोग असाध्य था।



सूर्योदय से आधी रात तक यह साहित्य का उपासक अंतर्जगत में डूबा हुआ, समस्त संसार से मुँह मोड़े, हृदय के पुष्प और नैवेद्य चढ़ाता रहता था। पर भारत में सरस्वती की उपासना लक्ष्मी की अभक्ति है। मन तो एक ही था। दोनों देवियों को एक साथ कैसे प्रसन्न करता, दोनों के वरदान का पात्र क्यों कर बनता?



और लक्ष्मी की यह अकृपा केवल धनाभाव के रूप में न प्रकट होती थी, उसकी सबसे निर्दय क्रीड़ा यह थी कि पत्रों के संपादक और पुस्तकों के प्रकाशक उदारतापूर्वक सहृदयता का दान भी न देते थे। कदाचित सारी दुनिया ने उसके विरुद्ध कोई षडयंत्र-सा रच डाला था। यहाँ तक कि इस निरंतर अभाव ने उसके आत्मविश्वास को जैसे कुचल दिया था।



कदाचित अब उसे यह ज्ञात होने लगा था कि उसकी रचनाओं में कोई सार, कोई प्रतिभा नहीं है और यह भावना अत्यंत हृदय-विदारक थी। यह दुर्लभ मानव-जीवन यों ही नष्ट हो गया। यह तस्कीन भी नहीं कि संसार ने चाहे उसका सम्मान न किया हो, पर उसकी जीवनकृति इतनी तुच्छ नहीं। जीवन की आवश्यकताएँ घटते-घटते संन्यास की सीमा को भी पार कर चुकी थीं।



अगर कोई संतोष था, तो यह कि उनकी जीवन-सहचरी त्याग और तप में उनसे भी दो कदम आगे थी। सुमित्रा इस दशा में भी प्रसन्न थी। प्रवीणजी को दुनिया से शिकायत हो, पर सुमित्रा जैसे गेंद में भरी हुई वायु की भाँति उन्हें बाहर की ठोकरों से बचाती रहती थी। अपने भाग्य का रोना तो दूर की बात थी, इस देवी ने कभी माथे पर बल भी न आने दिया।
अस्वीकरण