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कहानी --रंग गया राज्य


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yle='font-size:18px'>बहुत समय पहले की बात है। एक राज्य में रणकसिंह नाम का राजा हुआ करता था। वह सभी पर अपना हुक्म चलाता था। राज्य के सभी लोग उससे डरते थे। यहां तक कि उसने होली के त्योहार पर भी राज्य के सभी लोगों को किसी न किसी काम पर लगा दिया। दूसरे दिन होली खेली जानी थी। रानी ने रात को राजा रणकसिंह को गुलाल लगा दिया। राजा को रानी की यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। उन्होंने रानी पर बहुत गुस्सा किया। क्रोध में भरे राजा ने अपने सैनिकों को आदेश दिया, ‘राज्य में ऐलान कर दें कि आज से कोई भी होली नहीं खेलेगा। मुझे पूरे राज्य में कहीं कोई रंग नहीं दिखना चाहिए।’

प्रजा राजा के इस आदेश से दुखी हुई। लोग आपस में चर्चाएं करने लगे, ‘राजा ने यह अच्छा नहीं किया। साल में एक बार होली आती है और उस पर भी रंग न खेलें?’ मजबूर होकर उन्हें राजा का यह आदेश मानना ही पड़ा। किसी ने भी राजा के खौफ से एक-दूसरे को रंग लगाने का साहस नहीं दिखाया। इसी राज्य में एक बहुरूपियों की टोली रहती थी, जिसके मुखिया का नाम भीमा था। होली के दिन यह टोली तरह-तरह के भेष बनाकर ढोल-नगाड़े बजाते हुए खेल-तमाशे दिखाती थी। इनके खेल-तमाशे देखकर नगरवासी बहुत खुश होते थे और उन्हें ईनाम देते थे, लेकिन इस बार राजा के हुक्म के कारण सुबह से कोई इनका खेल देखने नहीं आया। भीमा ने अपने साथियों से कहा, ‘अगर जीवन में कोई रंग या उमंग न हो, तो हमारे बहुरूपिए बनने का फायदा ही क्या?’ सारे साथियों ने भीमा की इस बात पर हामी भरी। भीमा ने अपनी टोली के साथ महल जाने का निर्णय किया।

महल में पहुंचकर भीमा ने राजा से कहा, ‘महाराज, हमारी इच्छा है कि हम आपको अपना एक तमाशा दिखाएं।’ महाराज ने उन्हें अनुमति दे दी। टोली ने अपने खेल में एक राज्य का खेल खेला, जिसमें प्रजा हर वक्त उदास रहती थी। न कोई त्योहार मना रहा था, न कोई उमंग दिख रही थी। बस सभी दुखी थे। खेल खत्म होने के बाद राजा ने बहुरूपियों की टोली को ईनाम दिया और भीमा से पूछा, ‘भीमा, पहले ये बताओ कि इस तरह के दुखी राज्य की कल्पना तुम्हारे दिमाग में कहां से आई?’ भीमा ने जवाब दिया, ‘महाराज, ये तो अपना ही राज्य है।’ सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। तभी रानी भी बोलीं, ‘राजा साहब, आपने सभी लोगों को होली खेलने के लिए मना कर दिया है। पूरे राज्य मंे कहीं भी रंग नहीं दिखाई दिया। इसका मतलब यही हुआ न अपने राज्य के लोगों में रंग-उमंग बची ही नहीं।’ रानी की बात से राजा सोच में पड़ गए। उन्हें अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। वे भीमा के पास जाकर बोले, ‘भीमा, तुमने मेरी आंखें खोल दीं। अभी दिन पूरा गुÊारा नहीं है। चलो आज पूरे राज्यवासियों के साथ मैं भी होली खेलूंगा।’और फिर कुछ ही देर में पूरा राज्य रंग और गुलाल से रंग गया।


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प्रकाशन करता -- संजय मीणा
गाव --- बगड़ राजपूत
तहसील -- रामगढ
जिला- अलवर
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